काला तिल खायें: दाँत मजबूत बनायें

हम सभी जानते हैं कि तिल दो प्रकार का होता है काला तिल एवं सफेद तिल। तेल शब्द भी तिल शब्द से ही उत्पन्न हुआ है।
आयुर्वेद के वाग्भट रचित ग्रंथ ‘अष्टांगहृदयम्‘ में काल तिल को दाँतों के लिए बहुत उपयोगी बताया गया है। अष्टांगहृदयम् में चरण संहिता, सश्रुतसंहिता सहित अन्य आयुर्वेद के ग्रन्थों का सम्मिलित ज्ञान निहित है।

अष्टांगहृदयम् में वाग्भट ने लिखा है कि चार तोला अर्थात् लगभग चार मध्यम आकार के चम्मच भर काले तिलों को प्रतिदिन ठीक से चबाकर जो उसके बाद ठंडा पानी पीता है, उसके शरीर की पर्याप्त पुष्टि होती है अर्थात् उसका शरीर मजबूत बनता है और उसके दाँत मृत्युपर्यन्त अर्थात् आजीवन मजबूत बने रहते हैं। –

दिने दिने कृष्णतिलपकुञ्चं समश्नतां शीतजलानुपानम्।
पोषः शरीरस्य भवत्यनल्पो दृढीभवन्तयामरणाच्च दन्ताः।। अष्टांगहृदयम्, उत्तरस्थानम्

कहने का तात्पर्य है कि काले तिल के सेवन से दाँत और हड्डियाँ मजबूत होती हैं। आज मेडिकल साइंस ने भी काले तिल में कैल्शियम की अधिकता सिद्ध की है जो अस्थियों के निर्माण के लिये उत्तरदायी है।
तो फिर काला तिल खाइये… जीवन भर दाँतों की मजबूती बनाये रखिये।।

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