ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा

“ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा” पतञ्जलि के योगसूत्र के समाधिपाद का एक सूत्र है। इसकी व्युत्पत्ति है ऋतं सत्यं बिभर्ति इति। भृञ् धातु में ऋत् उपसर्ग तथा खच् और टाप् प्रत्यय द्वारा यह शब्द निष्पन्न हुआ है। इसका अर्थ है सत्यज्ञान को धारण करने वाली प्रज्ञा। इसे समझने के लिए योगदर्शन की रूपरेखा समझना आवश्यक है।

योगदर्शन में कहा गया है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ अर्थात् योग चित्तवृत्तियों का निरोध है। वहाँ सम्प्रज्ञात एवं असम्प्रज्ञात समाधि को योग कहा गया है। ये समाधियाँ चित्तवृत्तियों का निरोध करती हैं। चित्तवृत्तियाँ सात्विक, राजसिक एवं तामसिक होती हैं। चित्त की पाँच भूमियाँ होती हैं – क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरूद्ध। इसमें से प्रथम तीन में हुआ चित्तवृत्ति निरोध अल्पकालिक है। अतः इससे मोक्ष के लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव नहीं। चित्त की एकाग्र और निरूद्ध भूमियों में राजसिक और तामसिक वृत्तियों का पूर्ण निरोध हो जाता है केवल सात्विक वृत्ति ही रह जाती है।

योगदर्शन में चित्तवृत्ति निरोध केवल सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञातसमाधि में होता है। सम्प्रज्ञात समाधि में चित्त की मात्र सात्त्विक वृत्ति शेष रह जाती है। परिणामस्वरूप साधक समस्त वस्तुओं का भ्रांतिरहित और वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। इसीलिए इस समाधि को ‘सम्यक् प्रज्ञायतेऽस्मिन्निति सम्प्रज्ञातः समाधिः’ सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। इसी समाधि के सिद्धि पर प्रकृति और पुरुष का विविक्तिज्ञान हो जाता है। इसे ही विवेकख्याति कहते हैं। विवेकख्याति मोक्षदायिनी होती है। इसीलिए विवेकख्याति का लाभ दिलाने वाली इस समाधि को सम्प्रज्ञात योग कहा जाता है। इसकी सिद्धि चार सोपानों से होती है :-

वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनान्दानुगत और अस्मितानुगत।

इस चतुर्थ सोपान के ही पूर्ण होने पर विवेकख्याति का उदय होता है। इन चारों में प्रथम में सवितर्का एवं निवितर्का समापत्ति एवं शेष तीन में सविचारा और निर्विचारा समापत्ति होती है। अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा शांत हुये चित्त द्वारा भूतसूक्ष्माकार होकर भूतसूक्ष्मरूप आकार ग्रहण ही समापत्ति है। शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से युक्त समापत्ति सवितर्का कही जाती है। स्मृति के निवृत्ति पर ज्ञानात्मक रूप से शून्य मात्र अर्थ को प्रकाशित करने वाली समापत्ति निर्वितर्का होती है। सविचारा और निर्विचारा समापत्ति सूक्ष्म विषयों वाली होती है। ये चारों समापत्तियाँ सबीज समाधि कहलाती हैं। निर्विचारा समापत्ति के निर्मल हो जाने पर साधक को आध्यात्मिक प्रसाद प्राप्त हो जाता है और इस प्रकाश के प्राप्त हो जाने के बाद उसमें ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होता है।

वस्तुतः रजस् और तमस् ही आवरणकारक मल है। बुद्धि को ढँकने वाला है। उससे रहित प्रकाशस्वभाव वाले बुद्धिसत्त्व की रजस्तम से संपर्क रहित निर्मल एकाग्रता की धारा को योग दर्शन में वैशारद्य कहा गया है। जब निर्विचारा समापत्ति वाली समाधि से यह वैशारद्य उत्पन्न होता है तब साधक को अद्भुत बौद्धिक उत्कर्ष अर्थात् यथार्थविषयक, एक साथ सभी अर्थों को ग्रहण करने वाला स्पष्ट प्रज्ञाप्रकाश होता है। उस स्थिति में समाहित चित्त वाले योगी के वैशारद्य काल में जो विशिष्ट प्रज्ञा उत्पन्न होती है। उसका नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा है। ऋतम्भरा प्रज्ञा सत्य को धारण करती है। वह सर्वथा मिथ्याज्ञान रहित होती है।

वह ऋतम्भरा प्रज्ञा पदार्थों के विशेषार्थ के विषय की होने के कारण आगम और अनुमान ज्ञान से भिन्न विषय वाली होती है। उससे उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का बाधक होता है। यहाँ वृत्ति के निरोध के कारण समाधि उपस्थित रहती है। उस समाधि से ऋतम्भरा प्रज्ञा उत्पन्न होती है और उसी समाधि से प्रज्ञाजन्य संस्कार उत्पन्न होते हैं अन्य संस्कार नहीं उत्पन्न होते। ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार समुदाय वृत्तिरहित होता है। इस संस्कार समुदाय का भी निरोध हो जाने पर निर्बीजसमाधि सिद्ध होती है।

इसप्रकार ऋतम्भरा प्रज्ञा निर्बीजसमाधि के ठीक पहले की अवस्था है।

Leave a Reply