आयुर्वेद में धान

आयुर्वेद में धान्यवर्ग के अन्तर्गत धान का वर्णन मिलता है जहाँ इसे शालि और व्रीहि दो कोटियों में रखा गया है।
धान्यवर्ग में धान्य के शालिधान्य, व्रीहिधान्य, शूकधान्य, शिम्बीधान्य और क्षुद्रधान्य ये पाँच भेद किये गये हैं।

शालिधान्यं व्रीहिधान्यं शूकधान्यं तृतीयकम्।
शिम्बीधान्यं क्षुद्रधान्यमित्युक्तं धान्यपंचकम्॥१॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

इसमें से लालरंग के चावलों को शालि धान्य कहते हैं। साठी धान्यों अर्थात् जो बाली में ही पह जाते हैं, उनको व्रीहि धान्य कहते हैं। जओ आदि को शूकधान्य , मूँग आदि को शिम्बीधान्य और सावाँ-कोदो आदि को क्षुद्रधान्य कहते हैं।
शालिधान्य वे हैं जो हेमन्तऋतु में उत्पन्न होते हैं और भूसीरहित तथा श्वेत रंग के होते हैं।

कण्डनेन विना शुक्ला हैमन्ताः शालयः स्मृताः॥३॥
भावप्रकाश, धान्यवर्ग

भावप्रकाश में शालिधान्य की बहुत सी प्रजातियों का उल्लेख प्राप्त होता है यथा रक्तशालि, कलम, पाण्डुक, शकुनाहृत, सुगंधक (बासमती), कर्दमक, महाशालि, दूषक,पुष्पाण्डक, पुण्डरीक, महिष मस्तक, दीर्घशूक, कांचनक, हायन और लोध्रपुष्प आदि। वहाँ यह भी कहा गया है कि इसके अतिरिक्त भी बहुत से भेद हैं। अलग-लग स्थानों पर धान्यों के अलग-अलग नाम हैं। ग्रन्थविस्तार के भय से भावप्रकाशनिघण्टुकार ने अन्य नामों का उल्लेख नहीं किया है।

रक्तशालिः सकलमः पाण्डुकः शकुनाहृतः।
सुगन्धकः कर्दमको महाशालिश्च दूषकः।।४॥
पुष्पांडकः पुण्डरीकस्तथा महिषमस्तकः।
दीर्घशूकः काञ्चनको हायनो लोध्रपुष्पकः॥५॥
इत्याद्याः शालयः सन्ति बहवो बहुदेशजाः।
ग्रन्थविस्तारभीतेस्ते समस्ता नात्र भाषिताः॥६॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

भावप्रकाशनिघण्टु में शालि चावलों के गुणों का वर्णन करते हुये कहा है कि ये मधुर, स्निग्ध, बलदायक, बँधे हुये मल को निकालने में समर्थ, कसैले, हल्के, रुचिकारक, स्वर अर्थात् कण्ठ को उत्तम करने वाले, वीर्यवर्धक, पौष्टिक, अल्प मात्रा में वात-कफ उत्पन्न करने वाले, शीतल, पित्तनाशक तथा मूत्रवर्धक होतें हैं।

शालयो मधुराः स्निग्धा बल्या बद्धाल्पवर्चसः।
कषाया लघवो रुच्याः स्वर्य्या वृष्याश्च लघुपाकिनाः।
अल्पानिलकफाः शीताः पित्तघ्ना मूत्रलास्तथा॥८॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

भावप्रकाशनिघण्तु में सम्पूर्ण धान्यों में रक्तशालि को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। और इसे बलदायक, वर्ष को उत्तम बनाने वाला, त्रिदोषनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी, मूत्रकारक, स्वर को उत्तम करने वाला, वीर्यवर्धक, भूख बढ़ाने वाला, पुष्टिकारक तथा प्यास, जवर, विष, व्रण अर्थात् घाव, श्वास, खाँसी व दाह को नष्ट करने वाला बताया गया है।

रक्तशालिर्वरस्तेषु बल्यो वर्ण्यस्त्रिदोषजित्।
चक्षुष्यो मूत्रलः स्वर्य्यः शुक्रलस्तृड्ज्वरापहः॥१५॥
विषव्रणश्वासकासदाहनुद्वह्निपुष्टिदः।
तस्मादल्पान्तरगुणाः शालयो महदादयः॥१६॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

व्रीहिधान्य वे हैं जो वर्षा ऋतु में उत्पन्न होते हैं और कूटने पर श्वेत होते हैं तथा देर में पहते हैं।
कृष्णव्रीहि, पाटल, कुक्कुटाण्डक, शलामुख, जतुमुख आदि व्रीहिधान्य के भेद बताये गये हैं।–

वार्षिकाः काण्डिताः शुक्ला व्रीहयश्चिरपाकिनः।
कृष्णव्रीहिः पाटलश्च कुक्कुटाण्डकः इत्यपि॥१७॥
शालामुखो जन्तुमुख इत्याद्या ब्रीहयः स्मृताः।॥१८॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

जो धान्य अपने बाली के अन्दर ही पक जाते हैं उन्हें साठी धान्य कहते हैं। षष्टिक, शतपुष्प, प्रमोदक, मुकुन्दक, और महाषष्टिक आदि साठी धानों के भेद हैं।

गर्भस्था एव ये पाकं यांति ते षष्टिका मताः॥२२॥
षष्टिहः शतपुष्पश्च प्रमोदकमुकुन्दौ।
महाषष्टिक इत्याद्याः षष्टिकाः समुदाहृताः॥
भावप्रकाशनिघण्टु, धान्यवर्ग

साठी धान में व्रीहिधान्य और शालिधान्य दोनों के गुण मिश्रित होते हैं। अष्टांगहृदयम् में बताया गया है कि व्रीहि धान्यों में साठी धान्य उत्तम होता है। साठी धानों में गौर साठी को उत्तम है।–

षष्टिको व्रीहिषु श्रेष्ठो गौरश्चासितगौरतः।
अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः, ८

आयुर्वेद में मण्ड/ माँड़

चावल को अधिक पानी के साथ पकाने पर जो चिपचिपा गाँढा द्रव्य बनता है वहई माँड़ है। आयुर्वेद में चावल से चुदह गुना धिक जल लेकर उसमें चावल पकाने पर भात का अंश निकाल देने पर जो द्रव्य बचता है उसे माँड़ कहा गया है। आयुर्वेद में कृतान्नवर्ग के अन्तर्गत इसका वर्णन प्राप्त होता है। इसमें सोंठ और सेंधानक आदि मिलाकर खाया जाता है। यह भूख को बढ़ाता है तथा शीघ्र पचता है। अष्टाङ्गहृदयम् में माँड़ को कल्याणकारी, वातदोष का नुलोमन करने वाला, प्यास, ग्लानि आदि को दूर करने वाला, वमन, विरेचन आदि के बाद बचे हुये दोषों को दूर करने वाला, पाचन में सहायक, धातुओं को सम करने वाला , स्रोतों को मुलायम करने वाला, पसीना उत्पन्न करने वाला और जठराग्ने को प्रज्वलित करने वाला बताया गया है।–

शिवस्तत्र मण्डो वातानुलोमनः।
तृङ्ग्लानिदोषशेषघ्नः पाचनो धातुसाम्यकृत्॥
स्रोतोमार्दवकृत्स्वेदी सन्धुक्षयति चानलम्॥
अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः, २७-२८

आयुर्वेद में ओदन/भक्त/भात/पका हुआ चावल

भावप्रकाशनिघण्टु में भात के भक्त, अन्न, अंध, कूर, ओदन, भिस्सा, दीदिवि आदि संस्कृत भाषा मेम् नाम गिनाये गये हैं। तथा कहा गया है कि चावलों को अच्छी प्रकार से धुलकर पाँच गुना पानी में पकाकर, माँड़ निकाल देने पर भात तैयार होता है। वह भात उष्ण, निर्मल तथा गुणकारी होता है। भात भूख बढ़ाने वाला, पथ्य, भूख शान्त करने वाला, रुचिकारक और हल्का होता है।
बिना धोये चावलों से बना भात तथा बिना माँड़ निकाले भात भारी, अरुचिकारक और कफ को बढ़ाने वाला होता है।

भक्तान्नंच तथाऽन्धश्च क्वचित्कूरं च कीर्तितम्।
ओदनोऽस्त्रयी स्त्रियां भिस्सा दीदिविः पुंसि भाषित:॥४॥
सुधौतांस्तण्डुलान् स्फीतांस्तोये पञ्चगुणे पचेत्।
तदुक्तं प्रस्तुतं चोष्णं विशदं गुणवन्मतम्॥५॥
भक्तं वह्निकरं पथ्यं तर्पणं रोचनं लघु।
अधौतमस्रुतं शीतं गुर्वरुच्यं कफप्रदम्॥६॥
भावप्रकाशनिघण्टु, कृतान्नवर्ग

आयुर्वेद में कुछ स्थानों पर कहा गया है कि चावल से चौदह गुना पानी में पकाने पर जब पानी छानकर निकाल दिया जाय तो बचा हुआ चावल ओदन (भात) कहलाता है। अष्टाङ्गहृदय के अनुसार जो भात चावलों को भलीभाँति धोकर पकाया जाता है तथा पहने पर जिसमें से माँड़ निकाल लिया जाता है और जिसमें उष्णता बनी रही है, ऐसा भात जल्दी पचता है। पचने में लघु होता है।

सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नोऽत्यक्तोष्मा चौदनो लघुः॥
अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः, ३०

आयुर्वेद में धान के लावा/लाजा/खील के गुण

आयुर्वेद के प्रायः सभी ग्रन्थों ने लाजा/लावा का वर्णन किया है। भावप्रकाशनिघण्टु में धान का लावा बनाने की विधि के साथ उसके गुणों का भी वर्णन प्राप्त होता है
जिनसे चावल बनाया जाता है ऐसे छिलके सहित धान को लेकर भाड़ में भूजने/ भूनने से वह फूटकर बड़ी-बड़ी खीलों का स्वस्रूप धारण कर लेते हैं यही खीलें धान का लाजा/लावा हैं।
भावप्रकाशनिघण्टु के अनुसार धान का लावा मधुर, शीतल, हल्का, भूख बढाने वाला, मल-मूत्र में कम करने वाला, रूक्ष, बलदायक और पित्त, कफ, वमन, अतिसार, दाह, रक्तविकार, प्रमेह, मेद (मोटापा), तथा तृष्या (प्यास) का नाश करने वाला होता है।–

येषां स्युस्तण्डुलास्तानि धान्यानि सतुषाणि च।
भृष्टानि स्फुटितान्याहुर्लाजा इति मनीषिणः॥१७४॥
लाजाः स्युर्मधुराः शीताः लघवो दीपनाश्च ते।
स्वल्पमूत्रमला रूक्षा बल्याः पित्तकफच्छिदः।
छर्द्यतीसारदाहास्रमेहमेदस्तृषापहाः॥१७५॥
भावप्रकाशनिघण्टु, कृतान्नवर्ग

अष्टाङ्गहृदयम् में लावा को तृष्णा अर्थात् प्यास, वमन अर्थात् उल्टी, अतिसार, प्रमेह, मेदोवृद्धि (मोटापा), तथा कफदोष का विनाश करने वाला बताया गया है। इसे खाँसी और रक्तविकार को भी दूर करने वाला कहा गया है। लावा जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भूख बढ़ाता है। शीघ्र पचता है, शीतल होता है और शीतवीर्य है।–

लाजास्तृट्छर्द्यतीसारमेहमेदःकफच्छिदः।
कासपित्तोपशमना दीपना लघवो हिमा:॥
अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः, ३६

आयुर्वेद में पृथुक/चिपिटा/च्यूड़ा/ चिउड़ा/पोहा

भावप्रकाशनिघण्टु में कहा गया है कि भूसी सहित गीले धानों को थोड़ा सा भूनकर तत्काल कूटने पर वे चिपटे हो जाते हैं, इन्हें ही पृथुक अर्थात् चिउड़ा कहते हैं । आजकल बिना भूने भी चिउड़ा बनाया जाता है।
चिउड़े के गुण का वर्णन करते हुये भावप्रकाशनिघन्टु में कहा गया है कि यह भारी, वातनाशक, कफकारक होता है। दूध के साथ खाने पर चिउड़ा पौष्टिक, वीर्यवर्धक, बलदायक और मलभेदक होता है।

शालयः सतुषा आर्द्रा भृष्टा अस्फुटितास्ततः।
कुट्टितश्चिपिटाः प्रोक्तास्ते स्मृताः पृथुका अपि।।१७६॥
पृथुका गुरवो वातनाशनाः श्लेष्मला अपि।
सक्षीरा बृंहणा वृष्या बाल्या भिन्नमालाश्च ते॥१७७॥
भावप्रकाशनिघण्टु, कृतान्नवर्ग

अष्टाङ्गहृदयम् में चिउड़ा को पाचन में गुरु (भारी), बलवर्धक, कफकारक तथा विष्टम्भकारक (मल को बाँधने वाला) बताया गया है।

पृथुका गुरवो बल्याः कफविष्टम्भकारिण:।
अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः, ३६

खिचड़ी/ कृशरा

चावल और दाल मिलाकर भलीभाँति धोकर पाँच गुना जल में पकाने पर तथा पकने पर नमक, अदरक, हींग आदि उचित मात्रा में दालने पर खिचड़ी तैयार होती है। यह वीर्यवर्धक, बलदायक, भारी, कफ व पित्त को उत्पन्न करने वाली, देर में पचने वाली, बुद्धिवर्धक, मल-मूत्रकारक होती है।–

तण्डुला दालिसंमिश्रा लवणार्द्रकहिंगुभिः।
संयुक्ताः सलिले सिद्धाः कृशरा कथिता बुधैः॥९॥
कृशरा शुक्रला बल्या गुरुः पित्तकफप्रदा।
दुर्जरा बुद्धिविष्टम्भमलमूत्रकरी स्मृता॥१०॥
भावप्रकाशनिघण्टु, कृतान्नवर्ग

खीर/पायस

संस्कृत में खीर के पायस, परमान्न, क्षीरिका आदि नाम बताये गये हैं।
आयुर्वेद के अनुसार औटे हुए, गाढ़े किये गये स्वचछ दूध में भुने हुये च्चावल डालकर पहाने पर फिर उसमें घी और मिश्री मिलाने पर पहकर तैयार होने वाला पदार्थ खीर कहलाता है।
यह खीर दुर्जर है अर्थात् बुढ़ापे को दूर करने वाली है, पुष्टिकारक है, पौष्टिक है, बलवर्धक है, विष्टम्भकारक (मल को बाँधने वाली) है, पित्तदोष, रक्तपित्त और वायुदोष नाशक है।-

पायसं परमान्नं स्यात्क्षीरिकाऽपि तदुच्यते।
शुद्धेऽर्धपक्वे दुग्धे तु घृताक्तांस्तण्डुलान् पचेत्॥१५॥
ते सिद्धाः क्षीरिका स्याता ससिताऽऽज्ययुतोत्तमा।
क्षीरिका दुर्जरा प्रोक्ता बृंहणी बलवर्धिनी।
विष्टम्भिनी हरेत् पित्तं रक्तपित्ताग्निमारुतान्॥१६।\
भावप्रकाशनिघण्टु, कृतान्नवर्ग

इस प्रकार आयुर्वद में धान एवं धान से बनने वाले विभिन्न खाद्यपदार्थों का विधिवत् विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। आयुर्वेद में धान एवं धान से बनने वाले खाद्य पदार्थों के बाताये गये गुण आज भी प्रासंगिक हैं।

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