आयुर्वेद में तुलसी के गुण

तुलसी का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। तुलसी देवी के रूप में घर-घर पूज्य हैं। यही कारण है कि एक हिन्दू गृहस्थ के घर में तुलसी की अनिवार्य उपस्थिति होती है। तुलसी को परमकल्याणकारिणी माना जाता है। तुलसी का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व तो है ही तुलसी का आयुर्वेदिक महत्त्व भी है।

कोविड-19 संक्रमणकाल में रोगप्रतिरोधकता बढ़ाने हेतु प्रयुक्त औषधीय पौधों में तुलसी भी एक है। भारत में आयुर्वेदशास्त्र और लोक दोनों में तुलसीदल (तुलसी की पत्ती) का सर्दी-खाँसी-जुकाम-बुखार आदि के उपचार में प्रयोग किया जाता है।

तुलसी का विभिन्न रूपों में सेवन किया जाता है यथा-तुलसी की पत्ती के रस को निकालकर, पत्ती को उबालकर बचा हुआ पानी और सीधे हरी पत्ती का सेवन। प्रातःकाल खालीपेट तुलसी की कुछ पत्तियाँ निगलना स्वास्थ्य के लिये बहुत लाभकारी होता है। इससे रोगप्रतिरोधकक्षमा में वृद्धि होती है, भूख बढ़ती है, उदरविकार दूर होते है और व्यक्ति को खाँसी-सर्दी-ज्वर आदि होंने की सम्भावना कम होती है।

तुलसी के औषधीय गुण एवम् इसकी पवित्रता के कारण ही ग्रहणकाल में खाद्यसामग्रियों को ग्रहण के प्रभाव से बचाने हेतु , उनमें तुलसी की पत्ती डालकर रखा जाता है। भोजन में भी तुलसी की पत्ती डालना शुभ माना जाता है। इसीलिये विशेष अवसरों पर पहाये गये भोजन में अपरिहार्यरूप से तुलसी की पत्ती डाली जाती है। तुलसी की लकड़ी की माला भी बहुत पवित्र मानी जाती है।

तुलसी के प्रकार

तुलसी दो प्रकार की होती है-श्याम तुलसी एवं शुक्ल तुलसी। लोग में इन दोनों को क्रमशः श्यामा व रामा के नाम से जानते हैं। इनके अतिरिक्त एक वनतुलसी भी होती है।

संस्कृत में तुलसी के अन्य नाम

आयुर्वेद के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ’भावप्रकाशनिघण्टु’ में वर्णित है कि तुलसी शुक्ल एवं कृष्ण दो प्रकार की होती है। तुलसी के अन्य नाम सुरसा, ग्राम्या, सुलभा, बहुमंजरी, अपेतराक्षसी, गौरी, शूलघ्नी और देवदुन्दुभि हैं।

तुलसी शुक्ला कृष्णा च
तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी गौरी शूओलघ्नी देवदुन्दुभिः॥

भावप्रकाशनिघण्टु, पुष्पादिवर्ग, 58

तुलसी के औषधीय गुण

तुलसी के औषधीय गुणों का वर्णन करते हुये भावप्रकाशनिघण्टु में लिखा गया है कि तुलसी स्वाद में चरपरी, कड़वी, अग्नि प्रदीपक अर्थात् भूख बढ़ाने वाली, हृदय के लिये हितकारी, ऊष्ण अर्थात् गरम होती है।

तुलसी दाह और पित्त को बढ़ानेवाली होती है तथा कुष्ठ रोग(Leprosy), मूत्रकृच्छ्र (dysuria), रक्तविकार, पार्श्व की पीड़ा, कफ  तथा वात को नष्ट करती है। गुणों में शुक्ला तुलसी एवं कृष्णा तुलसी अर्थात् रामा व श्यामा एक जैसी हैं। दोनों का समान प्रभाव है।

तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्त्रपार्श्वरुक्कफवातजित्।
शुक्ला कृष्णा च तुलसी गुणस्तुल्या प्रकीर्तिता।

भावप्रकाशनिघण्टु, पुष्पादिवर्ग, 58

तुलसी का उत्पत्तिस्थान एवं पौधे की पहचान

तुलसी सर्वत्र उत्पन्न हो सकती है और प्रायः पूरे देश में पायी जाती है इसके इसी सर्वोपलब्धता के कारण इसको ’सुलभा’ कहा गया है तथा प्रत्येक स्थान पर पायी जाने के कारण ही इसे ’ग्राम्या’ कहा जाता है।

तुलसी के पौधे 5-6 फुट तक लम्बे हो सकते हैं। प्रायः तुलसी की पौधा एक से तीन फुट तक लम्बा होता है पर स्थानभेद व पोषणभेद के कारण इसकी लम्बाई और बढ़ सकती है। यह झाड़ी जैसा पौधा होता है पर इसमें किसी प्रकार के कांटे नहीं होते।

तुलसी की मंजरियाँ अर्थात् फूल इसकी शाखाओं के सर्वोच्च और अन्तिम भाग पर क्रमबद्ध रूप से लगते हैं और उन्हीं में तुलसी के बीज उत्पन्न होये हैं जो सूक्ष्म अर्थात् बहुत छोटे-छोटे होते हैं।

तुलसी की मंजरियों का यदि सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो देखेंगे कि ये छोटे-छोटे पत्तों के आकार के होती हैं। रामा तुलसी में ये हरी होती हैं और श्यामा तुलसी में श्यामा तुलसी के रंग से साम्य रखती हुयी थोड़ी बैगनी आभा लिये हुये होती हैं। चूंकि ये मंजरियाँ पत्तों जैसी दिखती हैं इसीलिये इनहें ’पत्रपुष्प’ भी कहते हैं।

शुक्ला तुलसी (रामा तुलसी) का पौधा सम्पूर्ण हरित वर्ण का होता है और कृष्णा तुलसी (श्यामा तुलसी) का पौधा बैगनी आभा लिये हुये होता है। इसके तना, पत्ती तथा मंजरी पर बैंगनी आभा होती है।

तुलसी जहाँ उगी होती है उसके आसपास  इसके बीजों का स्वतः वितरण हो जाता है और वर्षा ऋतु के बाद तुलसी के अनेक नवीन पौधे उस स्थान पर निकल आते हैं। इसीलिये तुलसी यदि कहीं बाग-बगीचे में लगी हो तो वहाँ अनेक तुलसी के पौधे झुण्ड में पाये जाते हैं।

वर्षाऋतु की समाप्ति पर तुलसी में फूल आते हैं। शीतऋतु तुलसी के विकास को बाधित करता है। शीत ऋतु में होने वाले तुषारापात से तुलसी की पत्तियाँ संकुचित हो जाती है और मुरझा जाती है। इस ऋतु में तुलसी की ठीक से देखभाल न करने से तुलसी का पौधा मुरझा जाता है और कई बार सूख भी जाता है।

लोक में तुलसी का प्रयोग: दादी-नानी के नुस्खे

तुलसी का दादी-नानी के नुस्खे में बहुत प्रयोग होता है। तुलसी की रांग गारकर (रस निकालकर) छोटे बच्चों को खांसी-जुकाम-बुखार तथा भूख न लगने में दिया जाता है।

चींटी, मधुमक्खी, बर्र आदि के काटने व डँसने पर तुलसी की कुछ पत्तियाँ लेकर हाथ में मसलकर उसका रस निकालकर प्रभावित स्थान पर लगाने से लाभ होता है।

जुकाम के कारण गले में होंने वाली खराश व पीड़ा में तुलसी की पत्ती का रस हल्का गुनगुना करके देना लाभकारी होता है।

सिरदर्द में तुलसी की पत्ती सूँघने से लाभ होता है तथा मन अच्छा होता है।

बार-बर मिचली आने पर तुलसी की पत्ती का रस पीने अथवा तुलसी की पत्ती उबालकर पीने तथा हाथ में लेकर सूँघने से उबकाई रुकती है तथा उल्टी नहीं होती।

तुलसी की ताजी पत्ती को पीसकर मुल्तानी मिट्टी और चन्दन के चूर्ण के साथ लेप बनाकर चेहरे में लगाने से चेहरे के दाग-धब्बे दूर होते हैं तथा मुखकान्ति वापस लौटती है।

तुलसी की पत्तियाँ छाया मेम् सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर चन्दन तथा मुल्तानी मिट्टी के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाने का लेप बनाया जाता है। इसे गुलाबजल अथवा शुद्ध जल में घोलकर चेहरे में लगाने से सौन्दर्य में निखार आता है।

तुलसी की पत्ती पीसकर फोड़े फुंसी, जले-कटे पर लगाने से भी लाभ होता है।

तुलसी की पत्तियों का लेप पसीने की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाने में सहायक है।

तुलसी की पत्तियाँ छाया में सुखाकर उसे चाय जैसे उबालकर सुबह-शाम पीने से कब्ज से छुटकारा मिलता है तथा कब्ज होने की सम्भावना से मुक्ति मिलती है।

तुलसी के बीज को भिगोकर उनका सेवन करने से पाचनशक्ति बढ़ती है तथा रुका हुआ मल बाहर निकलता है। कब्ज व अपच के समस्या भी ठीक होती है।

तुलसी मानवमात्र के लिये बहुविधि गुणकारी औषधि है जो हमारे घर-आँगन में सहज सुलभ है। इसे वनक्षेत्र, मरुक्षेत्र से लेकर महानगरों की उँची-ऊँची अटालिकाओं में लगाया जा सकता है। इस प्रकार कहीं भी रहकर इसे औषधीय गुणों का लाभ उठाया जा सकता है।

तुलसी को इसके अद्भुत औषधीय गुण के कारण ही भारतीय संस्कृति में देवत्व प्राप्त है।