आयुर्वेद के अनुसार दही के गुण एवं सेवनविधि


दूध, दही, मट्ठा (छाछ), पनीर, मक्खन, घी आदि शाकाहारियों के लिये कैल्शियम और वसा के प्रधान स्रोत हैं। आजकल इन पदार्थों की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। आजकल पैकेटबन्द दूध, दही, मक्खन, छाछ बाजार में उपलब्ध हैं, जिनमें कृत्रिम तरीके से वसा की मात्रा बढ़ायी या घटायी जाती है। बाजार में पूरी वसा वाला (full cream) दूध, अल्प वसा वाला टोंड दूध, अत्यल्प वसा वाला डबल टोंड दूध उपलब्ध है। यही स्थिति दही की भी है। पैकेटबन्द दही में घर पर गाय-भैंस के जमाये गये दही की अपेक्षा लैक्टोबैसेलस कम पाया जाता है। शीतन प्रक्रिया द्वारा दूध-दही को कई दिनों तक ताजा रखा जाता है। जिसका निश्चय ही गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। मक्खन, मट्ठा, छाछ भी बाजार में लवणविहीन और नमकीन मसालेयुक्त दोनों रूपों में उपलब्ध है। ताजे दूध, दही, मक्खन, मट्ठे के अभाव में लोग पैकेटबन्द उत्पादों का सेवन करते हैं। इन उत्पादों और पशुपालक परिवारों द्वारा अपने घर में तैयार किये गये मखन, दही, छाछ की कोई तुलना नहीं है।
आज समाज में दो प्रकार के वर्ग के व्यक्ति हैं। एक ऐसा वर्ग है जिसे स्वास्थ्य की कोई सुधि नहीं है। दूसरा वर्ग ऐसा है जो स्वास्थ्य-रक्षा के प्रति इतना सचेत और तत्पर है कि उसे जहाँ कहीं से भी कुछ भी स्वास्थ्यकर पौष्टिक पदार्थों की जानकारी मिलती है। उनका सेवन करने लगता है। सेवन करते समय वह ऋतु, अपनी शारीरिक स्थिति एवं आवश्यकता और खाद्यपदार्थ की मात्रा आदि बातों की अनदेखी करता है। जिससे अनेक बार किसी पदार्थ के अतिसेवन एवं अनुचित समय पर सेवन से होंने वाला दुष्प्रभाव भी देखने को मिलता है।
पृथ्वी पर उपलब्ध समस्त पदार्थों के सेवन के लिये मात्रा और काल का निर्धारण आयुर्वेद में किया गया है। आयुर्वेद के इन नियमों का सम्यक् रूप से पालन करने पर व्यक्ति अतिसेवन व अनुचित काल व अवस्था में सेवन के दुष्प्रभावों से बच सकता है।
सभी को स्वस्थ रहने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य की देखभाल बहुत अच्छी प्रवृत्ति है परन्तु शरीर की आवश्यकता तथा देश, काल, परिस्थिति, मात्रा, सेवन किये जाने वाले पदार्थ की गुणवत्ता आदि ऐसे पक्ष हैं जिनका सदैव ध्यान रखा जाना चाहिये। इन पक्षों को ध्यान में रखते हुये स्वास्थ्यरक्षा के लिये किया गया हर प्रयास फलदायी होगा। इन पक्षों की अनदेखी व उपेक्षा निश्चय ही कष्टकारक सिद्ध होगी। अतः आयुर्वेद के अनुसार विभिन्न पदार्थों की उत्तमावस्था, मध्यमावस्था, अधमावस्था, त्याज्यावस्था और उनके सेवन की विधि जानना बहुत आवश्यक है।
आइये इसी क्रम में हम जानते हैं दही और दही के सेवन के लिये आयुर्वेदप्रोक्त विधि-विधान।
अष्टाङ्गहृदयम् के सूत्रस्थानम् के अन्तर्गत द्रव्यगुणविज्ञानीयाध्याय के ’क्षीरवर्ग’ के अन्तर्गत दही के गुणों एवं सेवनविधि का वर्णन प्राप्त होता है। दही के गुण का वर्णन करते हुये वहाँ कहा गया है कि दही पचने में एवं रस में अम्ल अर्थात् खट्टा होता है। यह ग्राही अर्थात् मल को बाँधने वाला होता है और पचने में गुरु अर्थात् भारी होता है। दही के पचने में अधिक समय लगता है। दही उष्ण अर्थात् गरम होता है तथा वातनाशक अर्थात् वायुविकारनाशक होता है। दही मेदोधातु, शुक्र, कफ, पित्त, रक्त एवम् अग्नि अर्थात् भूख को बढ़ाने वाला होता है तथा शोथकारक, सूजन उत्पन्न करने वाला होता है। दही के सेवन से भोजन के प्रति रुचि बढ़ती है। इसीलिये दही का प्रयोग भोजन के प्रति अरुचि अर्थात् इच्छा न होंने पर किया जाता है। दही का प्रयोग ठण्ड लगकर आने वाले विषमज्वर, पीनसरोग (पुराना जुकाम/ साइनस) एवं मूत्रकृच्छ्ररोग (मूत्र त्याग में कष्ट) में लाभदायक होता है। ग्रहणी रोग (Irritable Bowel Syndrome) में अल्पवसा वाला मक्खन निकाला हुआ दही लाभकर होता है।–

अम्लपाकरसं ग्राहि गुरूष्णं दधि वातजित्॥ 29॥
मेदःशुक्रबलश्लेष्मपित्तरक्ताग्निशोफकृत्। रोचिष्णु शस्तमरुचौ शीतके विषमज्वरे॥30॥
पीनसे मूत्रकृच्छ्रे च, रूक्षं तु ग्रहणीगदे
(अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, 5.29-31)

इस प्रकार दही बल बढ़ाने वाला, पुष्ट बनाने वाला तथा उदर सम्बन्धी विकारों का शमन करने वाला है।

पृथ्वी पर प्राप्त हर पदार्थ ओषधि है यदि उसका सही समय एवं सही मात्रा में सेवन किया जाय । अतः आयुर्वेद के अनुसार दही का सेवन कब-कब करना चाहिये तथा कब-कब किन अवस्थाओं में नहीं करना चाहिये। किन पदार्थों के साथ दही का सेवन नहीं करना चाहिये। इन सब पर आयुर्वेद का मत जानना आवश्यक है। आयुर्वेद के अनुसार रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिये। इस बात को सामान्य जन जानते एवं पालन करते हैं। गरम दही, जिसे आग पर गरमाया गया हो या सूर्य के प्रकाश में गर्म हुआ हो ऐसे दही का का सेवन नहीं करना चाहिये। आयुर्वेद इसका निषेध करता है। आयुर्वेद के अनुसार वसन्त ऋतु, ग्रीष्म ऋतु एवं शरद ऋतु में दही का सेवन निषिद्ध बताया गया है। इसका कारण भी है। वसन्त ऋतुपरिवर्तन का समय है। अतः इस ऋतु में शीतोष्ण स्वभाव बना रहता है ऐसे में दही का सेवन विपरीत प्रभाव देने वाला होगा। ग्रीष्मऋतु अतिशय उष्ण समय है। ऐसे में दही का प्रभाव बहुत भारी होगा तथा पाचन में भारी होंने के कारण यह समस्या भी उत्पन्न कर सकता है। अतः इसकाल में तक्र और पानी मिले हुये मट्ठे का सेवन अधिक उपयुक्त माना जाता है। शीतऋतु अत्यन्त शीत होने के कारण दही के लिये उपयुक्त नहीं है। शीत में जठराग्नि मन्द रहती है तथा अम्लीय पदार्थों का सेवन बहुत हितकर नहीं होता। यदि इन कालों में दही का सेवन करना भी हो तो मूँग की दाल और उसके बड़ों के साथ सेवन करें। मधु, घी, मिश्री से रहित दही का सेवन नहीं करना चाहिये। आँवला से रहित दही का सेवन भी निषिद्ध है। दही का सेवन प्रतिदिन नहीं करना चाहिये। मन्दक दही अर्थात् ऐसा दही जो ठीक से जमा न हो, का सेवन नहीं करना चाहिये। यदि दही के सेवन में जो निषेध किया गया है उसकी उपेक्षा करके दही का सेवन किया गया तो उससे ज्वर, रक्तपित्त, विसर्प(त्वचारोग), कुष्ठरोग, पाणुरोग (पीलिया) एवं भ्रम (चक्कर आना) जैसे विकार उत्पन्न होते हैं-

नैवाद्यान्निशि नैवोष्णं वसन्तोष्णशरत्सु न॥31॥
नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं तन्नाघृतसितोपलम्। न चानामलकं नापि नित्यं नो मन्दमन्यथा॥32॥
ज्वरासृक्पित्तवीसर्पकुष्ठपाण्डुभ्रमप्रदम् ॥33॥

(अष्टाङ्गहृदयम्, सूत्रस्थानम्, 5.31-33)

इसप्रकार दही का सेवन तो बहुत ही हितकारी है परन्तु उसका सेवन करते समय ऋटु, समय, मात्रा और सेवन की बारम्बारता का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। दही में पायी जाने वाली वसा की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के लिये हितकारी नहीं होती। यह एक तनु, दुबले-पतले व्यक्ति के लिये गुणकारी हो सकती है। उसके शरीर में मेदावृद्धि कर सकती है परन्तु एक ऐसे व्यक्ति जिसके शरीर में पहले से ही वसा की मात्रा अधिक है, ऐसे व्यक्ति के लिये पूर्णवसायुक्त दही का सेवन अहितकर भी हो सकता है। त्वचाविकार से ग्रस्त हैं एवं जुकाम से पीडित व्यक्तियों को भी दही का सेवन सोच-विचारकर करना चाहिये। बहुत अधिक श्रम करके थके हुये व्यक्ति तथा गर्मी से तुरन्त आये हुये व्यक्तियों को तत्काल दही का सेवन नहीं करना चाहिये। किसी भी पदार्थ का उचित समय, मात्रा एवम् शारीरिक आवश्यकता के अनुसार सेवन सदैव हितकारी होता है अतः प्रत्येक पदार्थ के सेवन में इन तत्त्वों का विवेक अपरिहार्य है।