आक/मदार/सफेद मदार/लाल मदार/मन्दार/अर्क/Calotropis gigantea

मदार का पुष्प और फल आशुतोष भगवान् शंकर को बहुत प्रिय है। इसके बिना उनकी पूजा अधूरी है। मदार को हम पूरे देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र देख सकते हैं। सड़कों के किनारे, रेल की पटरियों के किनारे, कूड़े के पहाड़ों पर घूरों पर हर स्थान पर मदार खड़ा अपनी हरियाली बिखेरता दिखेगा। उसकी जिजीविषा श्लाघनीय और अनुकरणीय है।
भारतीय संस्कृति और परम्परा में प्रकृति संरक्षण को स्वभाव बनाया गया है। इसीलिए प्रकृति के विभिन्न तत्वों को हमारे दैनंदिन जीवन में जीवन्त बनाये रखने के लिए, धर्म और अध्यात्म से जोड़ा गया है। इसी क्रम में भूतभावन भगवान् शिव की अर्चना में प्रयुक्त पदार्थ और उनके विशेष उल्लेखनीय हैं। मदार-धतूर शिव की आराधना में अर्पित होने वाले प्रमुख तत्व हैं। साँप उनका विशेष स्नेहपात्र है। यह सब संरक्षण का उत्तम और सर्वजनसमादृत-स्वीकृत विधान नहीं तो भला और क्या था।
आज विज्ञान के प्रयोगों और परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि कठिनतम परिस्थितियों में भी अपनी जिजीविषा बनाय रखने वाले पौधे विशेषकर मदार और धतूर में भारी धातुओं सीसा (लेड) आदि अवशोषित करने की और उनकी विषाक्तता हरने की अद्भुत क्षमता है।
भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि ऐसी कोई वृक्ष-वनस्पति नहीं है जिसमें कोई औषधीय गुण न हो। यदि हम आक अर्थात् मदार के आयुर्वेदानुसार औषधीय गुणों को देखेंगे तो विस्मित हुये बिना नहीं रहेंगे।
मदार दो प्रकार का होता है – श्वेत और रक्त अर्थात् सफेद फूलों वाला मदार और लाल फूलों वाला मदार। सफेद फूलों वाले मदार का क्षुप अर्थात् पौधा कभी-कभी वृक्षाकार का भी होता है। प्रायः लोग इसे गणेश जी का प्रतीक मानते हैं और अपने घर के सामने लगाना शुभ मानते हैं। श्वेत मदार की जड़ का तंत्र-मंत्र में भी प्रयोग होता है। लाल फूलों वाले मदार का पौधा अपेक्षाकृत छोटा होता है। दोनों मदार में फूल गुच्छों में होते हैं तथा फल आम अथवा सेमल की फली जैसा लम्बा पोटलीकार होता है। पककर जब फल फूटता है तो उसमें से सेमल जैसी रुई निकलती है। बीज में कोमल रेशे गोलाकार जुड़े रहते हैं। सारे बीज फल के बीज स्थिति एक ठोस आधार से जुड़े होते हैं। फल पककर अपने आप फूटता है। और बीज कोमल रेशों सहित अपने आधार से अलग होकर उड़ने लगते हैं। ग्रीष्मकाल में वे ग्रामीण क्षेत्रों में घर-आँगन में भी उड़ते हुये देखे जा सकते हैं। बच्चों में उन्हें पकड़ने का बहुत कौतूहल देखा जा सकता है। अवध में मदार के इन रेशों को ‘भुवा’ कहते हैं।
सफेद मदार के विभिन्न नाम:-
अलर्क, गुणरूप, मन्दार, वसुक, श्वेतपुष्प, सदापुष्प, सबालार्क, प्रतीयस, श्वेतार्क, राजार्क, गुणरूपक, तपनश्वेत,, दीर्घपुष्प, शिवाह्वय, प्रताप, शीतार्कक, शर्करापुष्प, काष्ठील, वृत्तमल्लिका, वेधा, शम्भु और गुण रूपी ये श्वेत मदार के संस्कृत भाषा में विभिन्न नाम हैं।

हिन्दी में इसे सफेद मदार, सफेद आक, बांग्ला में – श्वेत आकन्द, मराठी में पाढरी रुई, गुजराती में धोलो आकड़ो, फारसी में दुध, अरबी में उपर तथा अंग्रेजी में क्राउन फ्लावर कहते हैं।

लाल मदार के विभिन्न नाम:-
अर्कपर्ण, विकीरण, रक्तपुष्प, शुक्लफल, स्फोट, और जितने भी सूर्य के नाम हैं वे सब जैसे क्षीरजल, शुकफल, तुलफल, अरक, सदासुम, प्रताप, क्षीरकाण्डक, विक्षीर, भाष्कर, विवस्वान्, हरिदश्व, अहर्मणि, अहर्बान्धव, अर्यमा, अहर्पति, उष्णरश्मि, भानु, विकर्त्तन, गणरूप, मन्दार, प्रभाकर, विभाकर, दिवाकर, सप्ताश्व, सविता, सूनु, विभावसु, आस्फोत, वसुक, हिमारात, पुच्छी, क्षीरी, खर्ज्जूघ्र, शीतपुष्पक, जम्मल, क्षीरपर्णी, सदापुष्प, आस्फोतक, आस्फोटक, रवि व कीरतनुफल।
हिन्दी में इसे लाल आक या लाल मदार, बांग्ला में आकन्द, मराठी में तावंडी रुई, गुजराती रातो आकड़ो, फारसी में खुर्क और अंग्रेजी में क्राउन फ्लावर और जायंट मिलकवीड कहते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार मदार के गुण :-
श्वेत व रक्त दोनों प्रकार के मदार दस्तावर, वात, कोढ़, खुजली, विष, व्रण, प्लीहा, गुल्म, बवासीर, कफ, उदररोग और मल के कृमियों को नष्ट करते हैं।
सफेद मदार का फूल वीर्यवर्धक, हल्का, भूख बढ़ाने वाला, पाचन ठीक करने वाला, अरुचि दूर करने वाला, मुख से पानी गिरना, खाँसी, बवासीर तथा श्वास रोग नष्ट करने वाला है।
लाल मदार का फूल मधुर, कटु, ग्राही है। कृमि, कफ, कोढ़, बवासीर, विष, रक्तपित्त, गुल्म तथा सूजन को नष्ट करता है। मदार का दूध कड़वा, गरम, चिकना, खारा और हल्का होता है एवं कोढ़, गुल्म तथा उदररोग नाशक है। विरेचन करवाने हेतु यह सर्वोत्तम औषधि है।
ग्रामीण भारत में मदार के पत्तों का उपयोग जोड़ों के दर्द में सेंकाई के लिये किया जाता है। मदार की दातुन करने का भी विधान है परन्तु दातुन करने से पहले मदार की छाल निकाल देनी चाहिये क्योंकि उसमें पाया जाने वाला दूध हानि पहुँचा सकता है। बुखार आदि में भी मदार का प्रयोग वैद्यों द्वारा किया जाता है। परन्तु सामान्यतः मदार का उपयोग करते समर सावधानी अपेक्षित है।

श्वेत मदार फोटो: मञ्जरी त्रिपाठी

संदर्भ :- भावप्रकाश

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