अष्टांगहृदयम्

अष्टांगहृदयम् आयुर्वेदाचार्य वाग्भट द्वारा विरचित आयुर्वेद-ग्रंथ है। यह ग्रंथ भारतीय आयुर्वेदशास्त्र के बृहतत्रयी के अन्तर्गत परिगणित होती है। वाग्भट ने अष्टांगहृदयम् के अतिरिक्त अष्टांगसंग्रह नामक एक अन्य आयुर्वेद ग्रंथ की रचना भी की।

जो विद्वानों के मत में अष्टांगहृदयम् के पूर्व की रचना है। प्राचीन परम्परा में कतिपय उदाहरण ऐसे भी प्राप्त हुये हैं जहाँ पौत्र का नामकरण पितामह के नाम के आधार पर अथवा उन्हीं के नाम पर हुआ है। अतः अनेक विद्वान् वृद्ध वाग्भट और अष्टांगहृदयम् के रचयिता वाग्भट दो पृथक् व्यक्तित्व मानते हैं।

परन्तु जब परम्परा में ग्रंथ – रचना प्रक्रिया देखी जाय तो हमें ज्ञात होगा कि विभिन्न विद्वानों ने एक ही विषय पर लघु अथवा सारांश लेखन किया है स्वयं उसी विषय पर व्याख्यापरक लेखन भी किया है जैसे नागेश द्वारा रचित मञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा। अतः संभव है कि वाग्भट एक ही व्यक्ति का नाम था। अधिकांश विद्वान् इस तर्क के समर्थक भी हैं। वाग्भट का समय 550ईस्वी सन् विभिन्न विद्वान् मानते है।

वाग्भट के ‘अष्टांगहृदयम्’ का उल्लेख चीनी यात्री ईत्सिंग ने अपने यात्रा-वृत्तान्त में किया है। ईत्सिंग की भारतयात्रा का समय 671-695 ईस्वी है अतः तब तक ‘अष्टांगहृदयम्’ का व्यापक प्रचार-प्रसार हो चुका था तथा उसे लोकप्रसिद्धि भी मिल चुकी थी।

‘अष्टांगहृदयम्’ पर वराहमिहिर के ज्योतिष-सिद्धान्तों का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। चूंकि का समय 505-587 ईस्वी है अतः वराहमिहिर के समकालीन अथवा उसके बाद अष्टांगहृदयम् की रचना हुयी होगी। अतः वाग्भट का काल 5वीं 6ठी शताब्दी ईस्वी निर्धारित किया गया है।’अष्टांगहृदयम् ‘एक बृहद् आयुर्वेद ग्रंथ है। इसके नामकरण कि आधार आयुर्वेद के आठ अङ्ग हैं-“कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान्। अष्टावङ्गानि।”

अर्थात् 1.कायचिकात्सातंत्र, 2. बाल(कौमारभृत्य) तन्त्र, 3. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), 4. ऊर्ध्वांगचिकित्सा (शालाक्य) तन्त्र, 5. शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), 6.दंष्ट्रा विषचिकित्स् (अगदतन्त्र) 7.जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र), 8. वृषचिकित्सा (वाजीकरण)। आयुर्वेद के ये आठों अंग चिकित्सा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि इनमें से कायचिकितसा अधिक समादृत व बहु – वर्णित है।वाग्भट ने आचार्य सुश्रुत की भाँति अपने ग्रंथ को छः भागों में विभक्त किया है जिनको ‘स्थानम्’ की संज्ञा दी है। वे ‘स्थानम्’ हैं -1.सूत्रस्थानम्2. शारीरस्थानम्3. निदानस्थानम्4. चिकात्सास्थानम्5. कल्प-सिद्धिस्थानम्6. उत्तरस्थानम् अष्टांगहृदयम् के ये सातों ‘स्थानम्’ पुनः विषयानुसार अध्यायों में विभक्त हैं और कुछ अध्याय पुनः वर्गों में विभक्त  हैं। यहाँ। उनका विवरण प्रस्तुत किया जाता है:-

सूत्रस्थानम्:-1.आयुष्कामीयाध्याय:2.दिनचर्याध्यायः3.ऋतुचर्याध्यायः4.रोगानुत्पादनीयाध्यायः5.द्रवद्रवकयविज्ञानीयाध्यायः- तोयवर्ग, क्षीरवर्ग, इक्षुवर्ग, मधुवर्ग, तैलवर्ग, मद्यवर्ग, मूत्रवर्ग।6.अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः – शूकधान्यवर्ग, शिम्बीधान्यवर्ग, कृतान्नवर्ग, मांसवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, औषधवर्ग।7.अन्नरक्षाध्यायः8.मात्राऽशितीयाध्यायः9.द्रव्यादिविज्ञानीयाध्यायः10.रसभेदीयाध्यायः11.दोषादिविज्ञानीयाध्यायः12.दोषभेदीयाध्यायः13.दोषोपक्रमणीयाध्यायः14.द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः15.शोधनादिगणसंग्रहाध्यायः16.स्नेहविधिरध्यायः17.स्वेदविधिरध्यायः18.वमन-विरेचन-विधिरध्यायः19.बस्तिविधिरध्यायः20.नस्यविधिरध्यायः21.धूमपानविधिरध्यायः22.गण्डूषादिविधिरध्यायः23.आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः24.तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः25.यन्त्रविधिरध्यायः26.शस्त्रविधिरध्यायः27.सिराव्यधविधिरध्यायः28.शल्याहरणविधिरध्यायः29.शस्त्रकर्मविधिरध्यायः।30.क्षाराग्निकर्मविधिरध्यायः

शारीरस्थानम् :-1.गर्भावक्रान्तिशारीराध्यायः2.गर्भव्यापच्छारीराध्यायः3.अंगविभागशारीराध्यायः4.मर्मविभागशारीराध्यायः5.विकृतिविज्ञानीयशारीराध्यायः6.दूतादिविज्ञानीयशारीराध्यायः

निदानस्थानम् :-1.सर्वरोगनिदानाध्यायः2.ज्वरनिदानाध्यायः3.रक्तपित्तकासनिदानाध्यायः4.श्वासहिध्मानिदानाध्यायः5.राजयक्ष्मादिनिदानाध्यायः – स्वरभेद-निदान, अरोचक-निदान, छर्दि – निदान, हृद्रोग-निदान, तृष्णा-निदान6.मदात्ययादिनिदानाध्यायः – मद-निदान, मूर्च्छाय-निदान, संन्यास-निदान7. अर्शोनिदानाध्यायः8.अतिसारग्रहणीदोषनिदानाध्यायः – अतिसार-निदान, ग्रहणी-निदान9. मूत्राघातनिदानाध्यायः – अश्मरीरोग10.प्रमेहनिदानाध्यः11.विद्रधि-वृद्धि-गुल्मनिदानाध्यायः – वृद्धिनिदान, गुल्मनिदान, आनाहनिदान12.उदरनिदानाध्यायः13.पाण्डुरोगशोफविसर्पनिदानाध्यायः – पाण्डुरोग-निदान, शोफनिदान, विसर्पनिदान14.कुष्ठश्वित्रक्रिमिनिदानाध्यायः – कुष्ठरोग-निदान, श्वित्रनिदान, क्रिमिनिदान15.वातव्याधिनिदानाध्यायः16.वातशोणितनिदानाध्यायः

चिकित्सास्थानम्1.ज्वरचिकित्साध्यायः2.रक्तपित्तचिकित्साध्यायः3.कासचिकित्साध्यायः4.श्वासहिध्माचिकित्साध्यायः5.राजयक्ष्मादिचिकित्साध्यायः – स्वरसाद-चिकित्सा, अरोचक-चिकित्सा6.छर्दि-हृद्रोग-तृष्णाचिकित्साध्यायः-हृदयरोग-चिकित्सा, तृष्णा-चिकित्सा 7.मदात्ययादिचिकित्साध्यायः-मदमूर्च्छाय-चिकित्सा, सन्न्यास-चिकित्सा8.अर्शश्चिकित्साध्यायः9.अतिसारचिकित्साध्यायः10.ग्रहणीदोषचिकित्साध्यायः11.मूत्राघातचिकित्साध्यायः12.प्रमेहचिकित्साध्यायः13.विद्रधि-वृद्धिचिकित्साध्यायः14.गुल्मचिकित्साध्यायः15.उदरचिकित्साध्यायः16.पाण्डुरोगचिकित्साध्यायः17.श्वयथुचिकित्साध्यायः18.विसर्पचिकित्साध्यायः19.कुष्ठचिकित्साध्यायः20.श्वित्रक्रिमिचिकित्साध्यायः21.वातव्याधिचिकित्साध्यायः22.वातशोणितचिकित्साध्यायः

कल्प-सिद्धिस्थानम् :-1.वमनकल्पाध्यायः2.विरेचनकल्पाध्यायः3.वमनविरेचनव्यापत्सिद्धिरध्यायः4.बस्तिकल्पाध्यायः5.बस्तिव्यापत्सिद्धिरध्यायः6.द्रवकल्पाध्यायः

उत्तरस्थानम् :-1.बालोपचरणीयाध्यायः2.बालामयप्रतिषेधाध्यायः3.बालग्रहप्रतिषेधाध्यायः4.भूतविज्ञानीयाध्यायः5.भूतप्रतिषेधाध्यायः6.उन्मादप्रतिषेधाध्यायः7.अपस्मारप्रतिषेधाध्यायः8.वर्त्मरोगविज्ञानीयाध्यायः9.वर्त्मरोगप्रतिषेधाध्यायः10.सन्धिसितासितरोगविज्ञानीयाध्यायः11.सन्धिसितासितरोगप्रतिषेधाध्यायः12.दृष्टिरोगविज्ञानीयाध्यायः13.तिमिरप्रतिषेधाध्यायः14.लिंगनाशप्रतिषेधाध्यायः15.सर्वाक्षिरोगविज्ञानीयाध्यायः16.सर्वाक्षिरोगप्रतिषेधाध्यायः17.कर्णरोगविज्ञानीयाध्यायः18.कर्णरोगप्रतिषेधाध्यायः19.नासारोगविज्ञानीयाध्यायः20.नासारोगप्रतिषेधाध्यायः21.मुखरोगविज्ञानीयाध्यायः22.मुखरोगप्रतिषेधाध्यायः23.शिरोरोगविज्ञानीयाध्यायः24.शिरोरोगप्रतिषेधाध्यायः25.व्रणप्रतिषेधाध्यायः26.सद्योव्रणप्रतिषेधाध्यायः27.भङ्गप्रतिषेधाध्यायः28.भगन्दरप्रतिषेधाध्यायः29.ग्रन्थ्यर्बुदश्लीपदापचीनाडीविज्ञानीयाध्यायः30.ग्रन्थ्यर्बुदश्लीपदापचीनाडीप्रतिषेधाध्यायः31.क्षुद्ररोगविज्ञानीयाध्यायः32.क्षुद्ररोगप्रतिषेधाध्यायः33.गुह्यरोगविज्ञानीयाध्यायः34.गुह्यरोगप्रतिषेधाध्यायः35.विषप्रतिषेधाध्यायः36.सर्पविषप्रतिषेधाध्यायः37.कीटलूतादिविषप्रतिषेधाध्यायः38.मूषिकालर्कविषप्रतिषेधाध्यायः39.रसायनविधिरध्यायः40.वाजीकरणविधिरध्यायःइस प्रकार ‘अष्टांगहृदयम्’ छः भागों में विभक्त है। वाग्भट ने स्वयं कहा है कि इस ग्रंथ में चरकसंहिता एवं सुश्रुतसंहिता दोनों की विषयवस्तु समाहित है। अतः जो जिज्ञासु उक्त दोनों संहिताओं का अध्ययन न कर सके उसके लिये यह एक उत्तम आयुर्वेद ग्रंथ है। वाग्भट ने ग्रंथ के समापन पर कहा है कि – अष्टाङ्गवैद्यकमहोदधिमन्थनेन योऽष्टाङ्गसङ्ग्रहमहामृतराशिराप्तः। तस्मादनल्पफलमल्पसमुद्यमानां प्रीत्यर्थमेतदुदितं पृथगेव तन्त्रम्।। अष्टांगहृदयम्, 6.14.80अर्थात् – कायचिकित्सा आदि आठ अंगों वाले आयुर्वेदशास्त्ररूपी महासमुद्र का मंथन करने से मुझे पहले ‘अष्ट्ङ्गसंहिता’ रूपी महान् अमृत-राशि प्राप्त हुयी थी, उसी में से उसी के समान फल देने वाले इस ‘अष्टांगहृदय’ नामक स्वतंत्र तंत्र की रचना उनके लिए की गयी है, जो आयुर्वेदशास्त्र का विस्तृत अध्ययन कर पाने में असमर्थ हैं।। 

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