अनुमान प्रमाण

अनुमान न्याय-वैशेषिक का दूसरा प्रमाण है। भारतीय दर्शन की प्रमाणमीमांसा में अनुमान का महत्वपूर्ण स्थान है।

अनुमिति का करण अनुमान है। अर्थात् अनुमान अनुमिति का साधन है।

अनुमितिकरणमनुमानम्

अब प्रश्न उठता है कि अनुमिति क्या है? परामर्श से उत्पन्न होने वाला ज्ञान अनुमिति है।

परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः।

अब प्रश्न उठता है कि ‘परामर्श’ क्या है? ‘परामर्श’ किसके कहते हैं? तो ‘व्याप्ति से विशिष्ट पक्षधर्मता ज्ञान को परामर्श कहते हैं । जैसे-अग्नि से व्याप्त यह पर्वत धूमवान् है’। –

व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः। यथा-वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत’ इति ज्ञान परामर्शः ।

उस परामर्श से उत्पन्न ज्ञान कि ‘पर्वत वह्निमान् है’ अर्थात् ‘पर्वत पर आग है’ यह ज्ञान अनुमिति है।

तज्जन्यं ‘पर्वतो वह्निमानि’ ति ज्ञानमनुमितिः।

यहाँ पूर्व में एक शब्द’ व्याप्ति ‘का प्रयोग हुआ है अतः उसे भी जान लेना आवश्यक है।’ जहाँ – जहाँ धूम (धुआँ) है, वहाँ – वहाँ अग्नि है’ – यह साहचर्य नियम व्याप्ति है। अर्थात् लोक में यह अनुभव सिद्ध है कि धुआँ आग की उपस्थिति में ही होता है ।इसलिए दोनों का संबंध सिद्ध है। यही व्याप्ति है।

‘ यत्र-यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरि’ति साहचर्यनियमो व्याप्तिः।

यहाँ एक अन्य शब्द का भी प्रयोग हुआ है – पक्षधर्मता।अतः उसे भी जानना आवश्यक है। व्याप्य का पर्वतादि में रहना पक्षधर्मता है।

व्याप्यस्य पर्वतादिवृत्तित्वं पक्षधर्मता।

पक्षधर्मताज्ञान और व्याप्तिज्ञान दोनों के सम्मिलन से दो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ही परामर्श कहते हैं और परामर्श के द्वारा उत्पन्न ज्ञान अनुमान है।

अनुमान दो प्रकार का होता है – स्वार्थानुमान एवं परार्थानुमान

अनुमानं द्विविधम्-स्वार्थं परार्थञ्च।

स्वार्थानुमान

स्वार्थानुमान अपने अनुमिति ज्ञान का हेतु है।

तत्र स्वार्थं स्वानुमितिहेतुः

अर्थात् जो अनुमान अपने स्वयं के ज्ञान के लिये किया जाय वह अनुमान स्वार्थानुमान है। जैसे कोई व्यक्ति स्वयं ही बारम्बार देखकर ‘जहाँ – जहाँ धुआँ है वहाँ – वहाँ अग्नि है’ अर्थात् जहाँ – जहाँ धुआँ होता है वहाँ – वहाँ अग्नि होती है इसप्रकार महानस अर्थात् रसोईं आदि (अग्नि के स्थानों में) में व्याप्ति को ग्रहण करके पर्वत के समीप जाकर उसमें अग्नि का (अर्थात् वहाँ आग है ऐसा) संदेह होने पर पर्वत में धुयें को देता हुआ’ जहाँ – जहाँ धूम है, वहाँ – वहाँ अग्नि है’ इस व्याप्ति का स्मरण करता है ।

इसके बाद यह पर्वत अग्नि से व्याप्त धूमवान् है’यह ज्ञान (उसमें) उत्पन्न होता है ।यही (ज्ञान) लिंगपरामर्श कहलाता है। (यहाँ लिंग का अर्थ चिह्न है) ।इस (ज्ञान) से पर्वत वह्निमान् है, अर्थात् पर्वत पर अग्नि है, यह अनुमिति ज्ञान उत्पन्न होता है । यह(ज्ञान) स्वार्थानुमान है। क्योंकि यहाँ ज्ञान स्वयं को हुआ है और स्वयं के ज्ञान के लिये अनुमान का प्रयोग किया गया है।

परार्थानुमान

जहाँ अनुमान अपने स्वयं के लिये नहीं अपितु किसी दूसरे को बताने अयवतवा समझाने के लिये किया जाता है ।वहाँ परार्थानुमान होता है ।इस अनुमान में पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग होता है ।

जिसमें स्वयं धुयें से अग्नि का अनुमान करके दूसरे को समझाने के लिये पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग किया जाता है ।वह परार्थानुमान है।

यत्तु स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं प्रति बोधयितुं पञ्चावयववाक्यं प्रयुज्यते तत्परार्थानुमानम्

दूसरों को बताने, समझाने और बोध कराने के लिये परार्थानुमान का प्रयोग किया जाता है । जैसे-पर्वत अग्नि से युक्त है क्योंकि यह धुयें से युक्त है, जो-जो धुयें से युक्त होता है नह-वह वह्निमान् अर्थात् अग्नि से युक्त होता है।जैसे- महानस (रसोईं) उसी प्रकार यह (यहाँ) है।अतः इसमें (इस पर्वत में भी) भी वैसे ही अग्नि है (जैसे रसोईंमें) । इसप्रकार प्रतिपादित लिंग (चिह्न) से दूसरा (व्यक्ति) भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है ।

यथा-‘पर्वतो वह्निमान्, धूमवत्त्वात्, यो यो धूमवान् स च वह्निमान् यथा महानसम्, तथा चायम्, तस्मात्तथेति’ अनेन प्रतिपादिताल्लिङ्गात् परोऽप्यग्निं प्रतिपद्यते।