अकबर के काल में अनूदित रामायण – फारसी रामायण-चित्रित रामायण

 अकबर के काल में अनूदित रामायण

भारत में मुसलमान शासकों का अंतिम वंश मुगल है जिसने शासन किया। मुगल शासनकाल में भारतीय चित्रकला के इतिहास में मुगल कला शैली, मुगल चित्रकला शैली का विकास हुआ। इसके पदचिह्न आज भी हम मुगलकालीन भवनों के ध्वंसावशेष में तथा मुगल कालीन रचनाओं एवं भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों की फारसी में अनूदित प्रतियों में देख सकते हैं। आज ये भारतीय धरोहर का एक विशिष्ट भाग हैं।

मुगल चित्रकला/कला शैली का आरम्भ अकबर के शासनकाल में 1560 ई. से हुआ। मुगल कला शैली भारतीय चित्रकलाशैली और फारसी चित्रकला शैली ‘सफाविद’ का मिश्रित रूप है। प्रकृति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म बिम्बों का अवलोकन एवं कोमल तथा सुगठित आरेखण द्वारा प्राकृतिक सुषमा का अभिभूत कर देने वाला सौन्दर्यवेष्ठित, अलंकृत चित्रण मुगल शैली की विशेषता है।

भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों के अनुवाद एवं उत्तम साहित्य की रचना हेतु अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक मकतबखाना अर्थात् पुस्तकालय स्थापित किया था। संस्कृत के अप्रतिम ग्रंथों रामायण, महाभारत, योगवासिष्ठ, भागवत और कथा-ग्रंथों का फारसी भाषा अनुवाद इसी पुस्तकालय में सम्पन्न हुआ।

अकबर के आदेश पर तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वान् अब्दुल कादिर बदायुंनी ने रामायण का फारसी भाषा में अनुवाद किया। रामायण जैसे बृहद् ग्रंथ के अनुवाद में लगभग चार वर्ष का समय लगा और कार्य यह 1584 ईस्वी से प्रारम्भ होकर 1589ईस्वी तक चला।

रामायण के इस अनुवाद में संस्कृत श्लोकों की व्याख्या के लिये अब्दुल कादिर बदायुंनी ने पं. देवी मिश्र की सहायता ली थी। अनेक ऐसे प्रसंग होते थे जिनके सम्यक् अनुवाद के लिये व्याख्या, विश्लेषण तथा चिन्तन की अपरिहार्य आवश्यकता होती थी। ऐसे समय में एक से अधिक संस्कृत विद्वानों से सहायता ली जाती थी।

रामायण के इस फारसी अनुवाद में कथा के विभिन्न प्रसंगों का स्थान-स्थान पर चित्र बनाया गया है। चित्रों का रंग-संयोजन, दृश्य-प्रस्तुतीकरण बहुत ही सराहनीय है। सम्पूर्ण अनुवाद में कुल 165 चित्र बनाये गये थे। चित्र बनाने का कार्य अनुवाद कार्य प्रारम्भ होने के उपरान्त सन् 1587 ई. में प्रारंभ किया गया। ये समस्त चित्र रामायण के बहुत ही महत्वपूर्ण और मार्मिक प्रसंगों पर आधारित हैं।

फारसी अनुवाद एवं चित्रकारों द्वारा लघुचित्रों में रामायण की घटनाओं का चित्रण अद्भुत एवं अद्वितीय कार्य था। इससे पूर्व इस प्रकार का कोई कार्य नहीं हुआ था।

दुर्भाग्यवश अकबर द्वारा जिस रामायण का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया गया था, वो प्रति हमारे पास आज सुरक्षित नहीं है। यह भी नहीं ज्ञात की वह प्रति कहाँ है। यह कहा जाता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दिल्ली में हुयी लूट में अकबर द्वारा अनुवाद करवायी गयी मूलप्रति खो गयी। संतोष का विषय यह है कि अकबर ने मूल अनूदित पाण्डुलिपि की कई प्रतियाँ भी लिखवायी थीं।

अकबर द्वारा अनुवाद करवाये गये रामायण की मूल प्रति तो आज उपलब्ध नहीं है पर उसकी दूसरी प्रतियों में सर्वाधिक सुरक्षित प्रति वर्तमान में जयपुर, राजस्थान के सवाई मानसिंह संग्रहालय में है। इस प्रति को वहाँ के राजा को मुगल शासन के उत्तराधिकारियों ने उपहारस्वरूप प्रदान किया था।

जयपुर संग्रहालय में सचित्र फारसी रामायण की सुरक्षित इस प्रति में 365 पृष्ठ हैं। इस अनुवाद में कुल 176 चित्र हैं। इसमें एक चित्र पर दो चित्रकारों का नामोल्लेख प्राप्त होता है। वस्तुतः एक चित्रकार ‘तरह’ अर्थात् रेखांकन करता था और दूसरा ‘अमल’ अर्थात् चित्रांकन करता था, चित्रों में रंग भरता था।

यह पुस्तक 1605 में मेरे किताबखाने में लायी गयी थी। यह पुस्तक हिन्दुओं की महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका भाषान्तरण मेरे पिता ने करवाया था।”

रामायण की इस प्रति में 1654 ईस्वी की शाहजहाँ की तथा 1658 व 1661 ईस्वी की औरंगजेब की मुहर लगी हुयी है।

अकबर की अनुमति से उनके शासनकाल के प्रसिद्ध विचारक, विद्वान् एवं कवि अब्दुल रहीम खानखाना के लिए रामायण की एक प्रति तैयार करवायी गयी थी। यह प्रति वर्तमान में ‘फ्रीर आर्ट गैलरी’ वाशिंगटन में सुरक्षित है। रामायण के फारसी अनुवाद की इस प्रति में 130 चित्र हैं।

अकबर ने फारसी रामायण की एक और प्रति भी लिखवायी थी अपनी माता हमीदाबानू बेगम के लिये। इसमें 55 चित्र हैं। यह प्रति वर्तमान में ईरान की राजधानी तेहरान स्थित इस्लामिक संग्रहालय में सुरक्षित है।

शाहजहाँ के शासनकाल में रामायण के दो अन्य फारसी अनुवाद किये गये थे। ये अनुवाद मुल्ला शेख सादुल्लाह और गुलामदास द्वारा किये गये थे।

फारसी में अनूदित रामायण की एक अन्य प्रति उत्तरप्रदेश के जनपद रामपुर में स्थित ‘रामपुर रज़ा लाइब्रेरी‘ में सुरक्षित हो। यह पुस्तकालय अपने फारसी, अरबी, उर्दू पाण्डुलिपियों हेतु विख्यात है। रामायण की इस फारसी प्रति का अनुवाद फर्रुखसियर के शासनकाल 1715-16 ईस्वी में सुमेरचंद द्वारा किया गया था। इसमें 258 लघुचित्र हैं। कहते हैं कि इसके चित्रों में सुनहरा और चमकदार रंग देने के लिये सोने-चाँदी के पानी का प्रयोग हुआ है। इसके चित्र तत्कालीन कला, वास्तुकला, वेषभूषा, आभूषण आदि पर प्रकाश डालते हैं।

इस प्रकार मुगलकाल में फारसी में अनूदित रामायण की सभी प्रतियों में प्रसंगानुसार लघुचित्रों का भी समावेश किया गया है। ये लघुचित्र मुगल शैली की न केवल विशेषता बताते हैं अपितु कतिपय मुगल शासकों की कलाप्रियता की साक्षी भी हैं। आज ये सभी प्रतियाँ जो विश्व में विभिन्न स्थानों पर संरक्षित हैं भारतीय कला के मुगलकालीन वैभव एवं दृष्टि को व्याख्यायित करती हैं।